Wednesday, 29 April 2015

महाराष्ट्र सरकारचे डोके फिरले आहे काय ??

महाराष्ट्रभरात ज्या बाबा पुरंदरेंच्या विक्रुत कार्याचा बोलबाला होत आसताना ,त्यांचे सोंग ढोंग उघडे पडत आसताना,लोक त्याला दुषणे देत आसताना ,महाराष्ट्र सरकार मात्र पुरंदरेला भुषणे देवून त्यांच्या विक्रुत कार्याची पोटच्या लेकी सारखी बोळवन करत आहे.ही केवढी लाजिरवाणी बाब आहे. राष्ट्रमाता जिजाऊंच्या बदनामी बद्दल आणि समस्त स्त्री जातीबद्दल काढलेल्या विक्रुत उदगारांबद्दल पुरंदरेला स्त्री आभुषणे घालून त्यांची धिंड काढून फासावर द्यायचे सोडून त्याचा महाराष्ट्र भुषनाने विक्रुतीचा गौरव करुन महाराष्ट्र सरकार स्वताच्या आया बहिणीच्या चारित्र्यावर शिंतोडे उडवत आहे की काय हा प्रश्न निर्माण झाला आहे .
या ब्राम्हणी वर्चस्ववादाच्या चढाइच्या राजकारणाला महाराष्ट्र सरकार हातभार लावत आहे.पुर्वीपासूनच सर्व पुरस्कार ब्राम्हणांस दिले गेले आहेत.आणि आजही ती रेघ सरकार ओढत आहे...बरे तुमच्या ह्या पुरस्कार वितरणाचे निकष तरी काय ?
केवळ ब्राम्हण आसने हा जातिवाचक निकष लावून छूपा ब्राम्हणवाद पोसण्याचे काम ब्राम्हणी सरकार करत आहे.हे आता सर्वश्रुतच झाले आहे.महाराष्ट्रात ब्राम्हणांशिवाय कुणी रहतच नाही का ?मराठा बहुजन समाजाच्या कार्यकत्रत्वाला आणि गुणवत्तेला या देशात काही किंमत आहे की नाही ?
किमान पुरस्कार देण्या आगोदर सरकारने त्यांची पुस्तके तरी वाचावीत .शिवरायांच्या राज्यात स्त्रीयांची विक्री व्हायची म्हणार्या एकदाही पोवाडा न गाइलेल्या खोट्या शाहिराचे कार्य ते काय आम्हास जरा प्रुव्ह करुन दाखवावे.केवळ पुरंदरेचे जानवे बघून पुरस्कार देणे हे अत्यंत तिरस्कारणीय कार्य आहे.आज जर मराठा बहुजण समाज गप्प बसणार आसेल तर उद्या नथुराम गोडसेच्या भाररत्नच्या केंदिय ठरावा बद्दल बातमी आलीच तर वाईट वाटून घेण्याची काहिच कारण नाही.किंवा अंतराष्ट्रीय स्तरावर एखाद्या ब्राम्हण दुताने गोडसेच्या पुळ्यांचा ठराव मांडून नोबेल बद्दल मागणी केली तर "आ " वासण्या इतपत सुद्धा बहुजन समाजाने कष्ट घेवू नयेत.
महाराष्ट्रात मात्रप्रेमाने पेटलेल्या शिवप्रेमींच्या जखमांवर मिठ चोळण्याचा जो सरकारने सपाटा चालू ठेवला आहे.तो त्वरित थांबवा....

Monday, 10 November 2014

दुसर्याचे आजेंडे










बरेच जन आमच्याकडे आमच्याच शत्रुचे आजेंडे घेवून येतात आणि त्या अजेंड्यावर काम करावे आशी इच्छा प्रगट करतात.धमकावतात सुद्धा .

काही तर आगदी चिडून ,लालबुंद होवून आगदी तापून पाठवले जातात.आमच्या शत्रुने आगदी ट्रेन करुन पाठवलेले असतात.ते आल्याबरोबर दिसतात तर आमचे पन बोली बोलतात शत्रुची .


"तुम्ही या विषयावर का बोलत
नाहित "

"या जमाती या जातिबद्दल किंवा या धर्मीयांबद्दल बद्दल तुमचे काय मत आहे "

"बघा हे किती माजले ,बघा यांची कट्टरता "

असेच त्यांचे काहिसे प्रश्न आसतात.अमचे अर्ध्या हळकुंडाने पिवळे झालेले लगेच पघळतात आणि त्यांचे मुद्दे मान्य करुन त्यांच्या आजेंड्यांवर काम करायला तयार होतात.

 प्रश्न हा आहे की त्यान्नी आनलेल्या आजेंड्यावर किंवा मुद्यांवर आपन पुर्वीपासुनच काम करतो का ?
आपले मुद्दे आणि आजेंडा काय आहे ,हे पहायला नको का ?
आपले सोडून दुर्याचे कसे मान्य करायचे ?


माझ्याकडे आसे बरेचजन फुकटे, शत्रुचे आजेंडे घेवून येतात .

आगदी थोड्याच दिवसापुर्वी काही कट्टर जाति व धर्मियांबद्दल बोलण्यासाठी येकजन आला होता.

मी म्हनालो बाबा तुझ्या समस्येसाठी आम्ही आमचे संघटण निर्माण नाही केले.त्यासाठी महाराष्ट्रात आणि भारतभरात काही पक्ष आणि संघटना कार्यरत आहेत तु त्यांच्याकडून मदत मिळव त्याना म्हनावे शत्रुचा बंदोनस्त करुन द्या .आणि बंदोबस्त करणे त्यांना जमत नसेल तर तसे त्यांच्याकडुन लिहून आन.कारण ह्या समस्येसाठी ते जर काम करत आसतित तर मग ती समस्या त्यान्नीच सोडवावी.त्याना नाहिच जमले तर आम्ही पुढे काय करायचे ठरवु.
तु माझ्याकडे चुकिच्या पत्यावर आलास .
 आमचा आजेंडा हा समता, स्वतंत्रता,बंधुत्व आणि न्याय यावर आधारीत आदर्ष समाज आणि राष्ट्र उभे करणे हा आहे.शिवरायाना अपेक्षीत असलेले रयतेचे राज्य आनने हा आहे.जिथे सर्

Saturday, 27 September 2014

ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार...


ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं। पढिए वह चौंकाने वाला सच


ओशो:


जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे। ईसामसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।

यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है।

पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बारा-बार कहते हैं- ' अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।' यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।

ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।

जीसस कहते हैं कि अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था। कौन हैं ये पुराने पैगंबर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं। पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं। और ईसा मसीह कहते हैं, मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है। यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं !

सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।

यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।

तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।

जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए। कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, जोशुआ- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। जीसस जोशुआ का ग्रीक रुपांतरण है। जोशुआ यहां आए- समय, तारीख वगैरह सब दी है। एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे। इसी वजह से वह स्‍थान भेड़ों के चरवाहे का गांव कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-पहलगाम, उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है- गड़रिए का गांव
जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।

यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी | इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया?

मूसा ईश्‍वर के देश इजराइल की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!

मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।

मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है।

सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।

Sunday, 31 August 2014

मित्रांनो...
बाबासाहेबांचे हे पत्र वाचून, तुमच्या डोळ्यातून पाणी नाही आले तर , मग बोला....
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रमा.... !

कशी आहेस रमा तू? तुझी, यशवंताची आज मला खूप आठवण आली. तुमच्या आठवणीनं मन खूपच हळवं झालं आहे आज. मागल्या काही दिवसातली माझी भाषणे फारच गाजली. परिषदेतील सर्वोत्कृष्ट भाषणे, प्रभावी वक्तृत्वाचा सर्वोत्कृष्ट नमुना असे माझ्या भाषणांबद्दल इकडच्या वर्तमानपत्रांमधून लिहून आले आहे. या पहिल्या गोलमेज परिषदेतील माझ्या भूमिकेचा विचार मी करीत होतो. आणि डोळयापुढे आपल्या देशातील सर्व पीडितांचे संसार माझ्या डोळयासमोर उभे राहिले.


दुःखांच्या डोंगराखाली ही माणसे हजारो वर्षे गाडली गेली आहेत. या गाडलेपणाला पर्याय नाही हीच त्यांची समजूत आहे. मी हैराण होतो आहे रमा ! पण मी झुंज देतो आहे. माझी बौध्दिक शक्ती परमवीर झाली होती जणू ! खूप भावना मनात दाटून आल्या आहेत. खूपच हळवे झाले आहे मन. खूपच व्याकूळ झाले आहे मन! आणि घरातल्या तुम्हा सर्वांची आठवण आली. तुझी आठवण आली. यशवंताची आठवण आली.


मला तू बोटीवर पोचवायला आली होतीस. मी नको म्हणत होतो तरी तुझे मन तुला धरवले नाही. तू मला पोचवायला आली होतीस. मी गोलमेज परिषदेला जात होतो. माझा सर्वत्र जयजयकार सुरु होता. तू पाहत होतीस. तुझं मन गदगदून आलं होतं. कृतार्थतेनं तू ओथंबून आली होतीस. तू शब्दांनी बोलत नव्हतीस; पण तुझे डोळे जे शब्दांना सांगता येत नसते तेही सांगत होते. तुझं मौन शब्दाहून अधिक बोलकं झालं होतं. तुझ्या गळयातील आवंढा तुझ्या ओठापर्यंत येऊन थडकत होता. ओठातील शब्दांच्या भाषेपेक्षा डोळयातील आसवांचीच भाषा त्यावेळी तुझ्या मदतीला धावली होती.


आणि आता इथे लंडनमध्ये या साऱ्याच गोष्टी मनात उभ्या राहिल्या आहेत. मन नाजूक झाले आहे. जीवात कालवाकालव होत आहे. कशी आहेस रमा तू ! आपला यशवंत कसा आहे? माझी आठवण काढतो तो? त्याचे संधीवाताचे दुखणे कसे आहे? त्याला जप रमा ! आपली चार मुलं आपल्याला सोडून गेलीत. आता आहे फक्त यशवंत. तोच तुझ्या मातृत्त्वाचा आधार आहे आता. त्याला आपण जपलं पाहिजे. यशवंताची काळजी घे रमा ! यशवंताला खूप अभ्यास करायला लाव. त्याला रात्री अभ्यासाला उठवीत जा. माझे बाबा मला अभ्यासासाठी रात्री उठवीत. तोवर ते जागे राहत. मला ती शिस्तच त्यांनी लावली. मी उठलो, अभ्यास सुरु केला की ते झोपत असत. अगदी प्रारंभी मला रात्री अभ्यासाला उठण्याचा कंटाळा येई. त्यावेळी अभ्यासापेक्षा झोप महत्त्वाची वाटे. पुढे तर आयुष्यभरासाठी झोपेपेक्षा अभ्यासच मोलाचा वाटत राहिला. याचं सर्वात जास्त श्रेय माझ्या बाबांना आहे. माझ्या अभ्यासाची वात तेवत राहावी म्हणून माझे बाबा तेलासारखे जळत राहत. त्यांनी रात्रीचा दिवस केला. अंधाराचा उजेड केला. माझ्या बाबांच्या कष्टांना आता फळे आली. फार फार आनंद वाटतो रमा आज. रमा यशवंताच्या मनाला असाच अभ्यासाचा छंद लागला पाहिजे. ग्रंथाचा त्याने ध्यास घेतला पाहिजे.


रमा, वैभव, श्रीमंती या गोष्टी निरर्थक आहेत. तू अवतीभोवती पाहते आहेसच. माणसं अशाच गोष्टींच्या सारखी मागे लागलेली असतात. त्यांची जीवनं जिथून सुरु होतात तिथच थांबलेली असतात. या लोकांची आयुष्ये जागा बदलीत नाहीत. आपल्याला असं जगून चालायचं नाही रमा. आपल्याजवळ दुःखांशिवाय दुसरं काहीच नाही. दारिद्रय, गरिबी यांच्याशिवाय आपल्याला सोबत नाही. अडचणी आणि संकटे आपल्याला सोडीत नाहीत. अपमान, छळ, अवहेलना या गोष्टी आपल्याला सावलीसारख्या जखडलेल्या आहेत.


मागे अंधारच आहे. दुःखाचे समुद्रच आहेत. आपला सूर्योदय आपणच झाले पाहिजे रमा. आपणच आपला मार्ग झाले पाहिजे. त्या मार्गावर दिव्यांची ओळ आपणच झाले पाहिजे. त्या मार्गावर जिद्दीचा प्रवास आपणच झाले पाहिजे.


आपणाला दुनिया नाही. आपली दुनिया आपणच निर्माण केली पाहिजे. आपण असे आहोत रमा. म्हणून म्हणतो यशवंताला खूप अभ्यास करायला लाव. त्याच्या कपडयांची काळजी घे. त्याची समजूत घाल. त्याच्यात जिद्द जागव. मला तुझी सारखी आठवण येते. यशवंताची आठवण येते.


मला कळत नाही असं नाही रमा, मला कळतं की तू दुःखांच्या या वणव्यात स्वतः करपून जात आहेस. पाने गळत जावीत आणि जीव सुकत जावा त्याप्रमाणे तू होते आहेस. पण रमा मी तरी काय करु ! एका बाजूने हात धुवून पाठीशी लागलेले दारिद्रय. दुसऱ्या बाजूने माझ्या जिद्दीने घेतलेला वसा. वसा ज्ञानाचा !


मी ज्ञानाचा सागर उपसतो आहे. मला इतर कशाचे यावेळी भान नाही; पण ही शक्ती मला मिळवण्यात तुझाही वाटा आहे. तू इथे माझा संसार शिवत बसली आहेस. आसवांचे पाणी घालून माझे मनोबल वाढवीत आहेस. म्हणून मी बेभान मनानं ज्ञानाच्या तळगर्भाचा वेध घेतो आहे.


खरं सांगू रमा, मी निर्दय नाही. पण जिद्दीचे पंख पसरून आकाशात उडणाऱ्या मला कोणी सादही घातली, तरी यातना होतात. माझ्या मनाला खरचटतं आणि माझ्या रागाचा भडका उडतो. मलाही हृदय आहे रमा ! मी कळवळतो. पण मी बांधलो गेलो आहे क्रांतीशी ! म्हणून मला माझ्या स्वतःच्या भावना चितेवर चढवाव्या लागतात. त्याच्या तुला, यशवंतालाही कधी झळा पोचतात. हे खरं आहे; पण यावेळी रमा मी हे उजव्या हाताने लिहितो आहे आणि डाव्या हाताने अनावर झालेली आसवे पुसतो आहे. सुडक्याला सांभाळ रमा. त्याला मारु नको. मी त्याला असे मारले होते. त्याची आठवणही कधी त्याला करुन देऊ नको. तोच आता तुझ्या काळजाचा एकुलता एक घड आहे.


माणसांच्या धार्मिक गुलामगिरीचा, आर्थिक आणि सामाजिक उच्चनीचतेचा आणि मानसिक गुलामगिरीचा पत्ता मला शोधायचा आहे. माणसाच्या जीवनात या गोष्टी ठाण मांडून बसलेल्या आहेत. त्यांना पार जाळून-पुरुन टाकता आला पाहिजे. समाजाच्या स्मरणातून आणि संस्कारातूनही या गोष्टी नाहीशा झाल्या पाहिजेत.


रमा ! तू हे वाचते आहेस आणि तुझ्या डोळयात आसवं आली आहेत. कंठ दाटला आहे. तुझं काळीज थरथरायला लागलं आहे. ओठ कापू लागले आहेत. मनात उभे राहिलेले शब्द ओठापर्यंत चालतही येऊ शकत नाहीत. इतकी तू व्याकूळ झाली आहेस.


रमा, तू माझ्या आयुष्यात आली नसतीस तर? तू मनःसाथी म्हणून मिळाली नसतीस तर? तर काय झालं असतं? केवळ संसारसुखाला ध्येय समजणारी स्त्री मला सोडून गेली असती. अर्धपोटी राहणे, गोवऱ्या वेचायला जाणे वा शेण वेचून त्याच्या गोवऱ्या थापणे किंवा गोवऱ्या थापायच्या कामावर जाणे कोणाला आवडेल? स्वयंपाकासाठी इंधन गोळा करायला जाणे, मुंबईत कोण पसंत करील. घराला ठिगळे लावणे, वस्त्रांना शिवत राहणे, एवढयाच काडयाच्या पेटीत महिना निभला पाहिजे, एवढेच ध्यान्य, एवढेच तेलमीठ पुरले पाहिजे हे माझ्या मुखातून बाहेर पडलेले गरिबीचे आदेश तुला गोड वाटले नसते तर? तर माझे मन फाटून गेले असते. माझ्या जिद्दीला तडे गेले असते. मला भरती येत गेली असती आणि तिला त्या त्या वेळी लगेच ओहोटीही लागली असती. माझ्या स्वप्नांचा खेळच पार विस्कटून गेला असता रमा ! माझ्या जीवनाचा सगळा सूरच बेसूर झाला असता, सगळीच मोडतोड झाली असती. सगळाच मनःस्ताप झाला असता. मी कदाचित खुरटी वनस्पतीच झालो असतो. जप स्वतःला जशी जपतेस मला. लवकरच यायला निघेन काळजी करु नकोस.

सर्वांस कुशल सांग.....!
कळावे,

तुझा.... भीमराव.....!
लंडन, ३० डिसेंबर १९३०

(यशवंत मनोहर यांच्या 'रमाई' या पुस्तकातून साभार)

Thursday, 28 August 2014

म्हणे धर्म ग्रंथांची चिकित्सा करायाची नाही.


 ब्राम्हनानी या देशात ज्या पोथ्या लिहुन ठेवल्या .त्यात सर्व आवास्तव आतिरंजित आनि काल्पनिक मसाला लेवलेल्या कथा सापडतात.ह्या कथांची जर समीक्षा करायचे म्हटले तर तोंडात आळ्या पडतात म्हणे.
हल्ली बर्याच जणांच्या भावनाही दुखु लागल्या.बरे ब्राम्हणांपेक्षा आमच्याच चोमड्या लोकाना हे सहण होइना.जणु काय धर्मग्रंथ लिहिनारे ब्राम्हण यांचे नाजायज बाप होते .
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तरीही आपण गणेश जन्माच्य कथेची समीक्षा करुच
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येकदा पार्वती आंघोळीला गेली आनि तिने .दरवाज्यावर पहारेकरी म्हनुन आंगावरल्या मळाचा गणपती बसवला.

🔶प्रश्न
1)काय मळाचा बनवलेला गणपती जिवंत होवु शकतो .
2)बरे पार्वती येवढी घाणेरडी होती का की जिच्या आंगावर येवढा मळ निघाला.
3)पार्वतीच्या बाथरुमला दरवाजे नव्हते काय ?
4)दरव्याज्यात उभे करायला कुनि दासदास्या नव्हत्या काय ?

आनि आपल्या बायकोला भेटायला शिव आला .तेव्हा गणपतीणे शिवाला बाथरुम मधे जाउ देन्यास मज्जाव केला.
मला आडवनारा तु कोन हे शिवाने विचारले .
मी पार्वतीपुत्र आहे गणपतीने सांगितले.मग मला कसे माहिती नाही आसे शिव म्हनाला.प्रंचंड भांडणे झाली ,युद्ध झाले.
 या युद्धात गणपती मारला गेला.

🔶प्रश्न
1)शिवाला आसे कोनते कोम होते की तो चक्क बायकोला बाथरुम मधे भेटायला गेला ?
शिव थोडाही थांबु शकत नव्हता का ?ज्यामुळे तो गणपतीशी युद्ध करायला तयार झाला ?होल ,बेडरुम सोडुन बायकोला बाथरुम मधे भेटन्याची कारणे धर्मग्रंथ सागतिल काय ?
2)हा गणपती माझा मुलगा आहे हे शिवाला माहिती नव्हते .मग तो नाजायज होता की काय ?
3)बाप मुलाला येकमेकांची ओळख कशी नव्हती.?शिव तर तिन डोळ्याची देवता.
4)बाहेर येवढी मोठी भांडणे चालु आहेत हे पार्वतीला न कळायला ती काय हेडफोन लावुन आंघोळ करत होती की शावर चालु आवाज नाही आला.
5) मुलाचे मुंडके उडवे पर्यंत पर्वती येवढ्यावेळ आंघोळ करत होती काय ?

पार्वती बाहेर आली .पहाते तर काय मुलगा मारला गेलाय .ती शिवाला भांडली .माझा मुलगा जिवंत पाहिजे म्हनाली.शिवाने त्रिशुल फेकला .आणि पहिला प्राणि जो दिसेल त्याचे मुंडके आनुन गणपतिला आनुन बसवले.

🔶प्रश्न
1) गणपती जिवंतच करायचा होता तर बाजुला पडलेले पहिलेच मुंडके का नाहि बसवले गेले ?
2) माणसाला हत्तिचे मुंडके बसेल काय ?
3)द्विपाद प्राण्याला चतुस्पाद प्राण्याचे मुंडके बसते .हे विन्यान मान्य करेल काय ?डोक्टर मान्य करतिल काय ??


मित्रान्नो ही शिव पार्वती आनि गणपतीची सरळ सरळ बदनामी आहे.जी ब्राम्हणान्नी केली..हा ब्राम्हणी खोटेपणा उघड करा
?तर्क करा .सत्य समजुन घ्या.हे av

Thursday, 14 August 2014

!!  युगारंभ  !!

इरावती कर्वे यान्नी युगांत लिहीले .हा शब्द नकारात्म आर्थाचा आहे.म्हंजे युगाचा अंत .त्यांच्या द्रस्टिने तो युगांतच आहे.पन आमच्या द्रस्टीने तो युगारंभ आहे.ब्राम्हणीयुग संपुन आता कुठे आब्राम्हणी युगाची पहाट होत आहे.
" होय हा युगारंभच आहे "
डो.बाबासाहेब आंबेडकर यान्ना आपेक्षीत आसलेला समता ,स्वतंत्रता ,आनि न्याय यावर आधारीत आदर्ष समाज आनि रास्ट्र निर्माण करने हे आमच्या आमच्या युगात करावयाचे बाकी आसलेले काम आहे.

संविधानाच्या रुपाने आमचा युगारंभ झाला.पन इथे परत प्रतिकारंती करण्याची सर्व तयारी ब्राम्हण करुन बसलेत .
म्हनुन मी लिहीतोय.लिहिनार लिहिल.

मी नितिन सावंत ,
या देशाचा भुमीपुत्र या नात्याने ,भारतभुची हाजारो वर्षाची मी व्यथा मांडनार आहे..
आमच्यावर झालेले  धार्मीक ,सांस्क्रतीक ,मानसिक आन्याय आत्याचार.

Thursday, 10 July 2014

सम्राट आशोक  आणि मोर्य साम्राज्य









मौर्य साम्राज्य हे प्राचीन भारताच्या इतिहासातील एक प्रमुख साम्राज्य होते. त्यावर इ.स.पू. ३२१ ते इ.स.पू. १८५ पर्यंत मौर्य वंशाने राज्य केले होते. गंगेच्या खोऱ्यामधील मगध राज्यापासून उगम झालेल्या या साम्राज्याची राजधानी पाटलीपुत्र (आजचे पाटणा) ही होती. हे साम्राज्य इ.स.पू. ३२२ मध्ये चंद्रगुप्त मौर्य याने स्थापन केले. त्याने नंद घराण्याला पराभूत करून आपले साम्राज्य प्रस्थापित केले. त्याने भारतातील सत्तांच्या विघटनाचा फायदा उठवून आपल्या साम्राज्याचा पश्चिमेकडे व मध्य भारतात विस्तार केला. इ.स.पू. ३२० पर्यंत या साम्राज्याने अलेक्झांडरच्या प्रांतशासकांना (क्षत्रप) हरवून पूर्णपणे वायव्य भारत ताब्यात घेतला होता.

५०,००,००० वर्गकिमी एवढा प्रचंड प्रदेश ताब्यात असलेले मौर्य साम्राज्य हे तत्कालीन सर्वांत मोठ्या साम्राज्यांपैकी एक, व भारतीय उपखंडातील सर्वांत मोठे साम्राज्य होते. आपल्या सर्वोच्च शिखरावर असताना हे साम्राज्य उत्तरेला हिमालय, पूर्वेला आसाम, पश्चिमेला पाकिस्तान, अफगाणिस्तान व इराणचे काही भाग इतके पसरले होते. भारताच्या मध्य व दक्षिण प्रदेशांमध्ये चंद्रगुप्त व बिंदुसार यांनी कलिंग (सध्याचा ओरिसा) हा प्रदेश वगळता विस्तार केला. कलिंग नंतर सम्राट अशोकाने जिंकून घेतला. अशोकाच्या मृत्यूनंतर साठ वर्षांनी मौर्य साम्राज्याचा अस्त झाला. इ.स.पू. १८५ मध्ये शुंग या ब्राम्हण साम्राज्याने मौर्यांना कपटाने संपवुन मौर्य साम्राज्य संपुष्टात आणले.

चंद्रगुप्ताने आपल्या कारकीर्दीत सिंधू नदीपलीकडील अलेक्झांडरच्या साम्राज्याचा प्रदेश जिंकून घेतला. चंद्रगुप्ताने सेल्युकस निकेटर याला पराभूत करून इराणचेही काही भाग जिंकून घेतले.

कलिंग युद्धानंतर सम्राट अशोकाच्या कारकीर्दीत कलिंग युद्धानंतर साम्राज्याने ५० वर्षे शांतता व सुरक्षितता अनुभवली. सम्राट आशोक यान्नी आपल्या कारकिर्दित भारतात येकुन 64 हजार विहारे बांधली होती .पन आज ती विहारे कुठेत हा फार मोठा प्रश्न आहे.

Saturday, 21 June 2014

संत तुकोबाराय 





येकदा जगदगुरु संत तुकोबाराय पुन्यातुन दिंडि घेवुन जात होते .मुख्य पुन्याततुन जाताना येका भर चोकात जोराचा पाउस सुरु झाला.दिंडितले सर्व वारकरी आडोसा शोधत इकडे तिकडे पळायला लागले.आणि सर्वजन वेगवेगळ्या ठिकाणी व्हरांड्यात वगैरे जावुन उभे राहीले .परंतु तुकोबाराय मात्र पावसातच भिजायला लागले .त्याच चोकात येकी कडुन मंदिर तर दुसरी कडुन मस्जिद होती .मंदिराच्या ब्राम्हनानी लगेच दरवाजे बंद केले.पन मस्जिदित मात्र चर्चा सुरु झाली ." आरे ओ तुकाराम भिग रहे है." "ओ बहुत ही बडे संत है "
वगैरे वगैर
आणि मग काय आश्चर्य मस्जितीतील मुसलमानानी तुकोबारायाना आत मधे आदरपुर्वक धरुन नेले .नंतर सर्व दिंडि मस्जिद मधे गेली.सर्व वारकरी मस्जिदमधे जमले.रात्रीची किर्तनाची वेळ झाली.मुर्ती पुजा न माननार्यांच्या मस्जिदित तुकोबा काय बोलतील आनि कसे किर्तन करतील याची सर्वाना उत्कंठा लागली .तुकोबा किर्तनाला उभे राहीले आणि आभंग घेतला.

आल्ला देवे अल्ला दिलावे !
अल्ला दारु अल्ला खिलावे !!
अल्ला बगर नही कोये !
अल्ला करे सो ही होये !! 1 !!

(आभंग क्र.444.गाथा देहुची प्रत )
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बोला जगदगुरु संत तुकाराम महाराज की ...
नितिन सावंत परभणी
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Tuesday, 6 May 2014

ब्राम्हण कभी इमानदार नही हो सकता

ब्राम्हण कभी इमानदार नही हो सकता
1) प्रतीदिन जिसको हिंसा करके बली चढायाजाता है उस महाकाली की पुजा ब्राम्हन करता है . यानी की हिंसा का ब्राम्हान समर्थण करता है .
ओर दुसरी तरफ महावीर ओर तथागत बुद्ध की मुर्ती के सामने आहींसा की बात करता है
2) ब्राम्हण उस पर्शुराम की पुजा करता है जिसने 21 बार क्षत्रियोंका नरसंहार कीया
ओर उस क्षत्रिय राम की भी पुजा कर्ता है .
3)ब्राम्हाण खुद को हिंदु धर्म का ठेकेदार केहलवाता है ओर जिस हिंदु धर्म मे पिर , दरगाह को मान्यता नही है फिर भी उस दरगाह ,पिर का पुरोहीत पुजारी बनता है .
4) 33 करोड देवी देवताओ को मान्यता देनेवाला ब्राम्हाण साइ मंदिर मे जाकर केहता है " सब का मालिक येक "
5) गो हमारी माता है केहनेवाला ब्राम्हण आपनी शादी मे आटे की गाय काटता है .ओर गाय भी खाता है
6)  कभी केहता है मुसलमान खराब है तो कभी केहता हॆ बोद्ध आछे नाही है
ओर रेस्तेदारी तो दोनोसे भी करता है . झगडे लगाने मी हमेश्या माहीर
7)स्टेज से समानता के उपर बडी उचे आवाज मी भाषण देनेवाला ब्राह्मण . घरमे छुत आछुत की बाते करता है . असमानता , गैर बराबरी हमेश्या बरकरार रखनेका काम ब्राह्मण करता है
8)मंदिरो आश्रामोन्से से अंधश्रद्धा का प्रचार करनेवाला ब्राह्मण अंधश्रद्धा निर्मुलन समितीमे भी  काम करता है .

दोस्तो दोहरे चरीत्रवाले लोग कभी इमानदार नही होते .और ब्राम्हाण हामेश्या दोहरे चरीत्रमे जीता है .ब्राम्हन बेइमान है .
तो इन बेइमानो को हाटाओ इस देश से
 ब्राह्मण भगवो
देश बचावो

Monday, 14 April 2014

कॉ. शरद पाटिल

जानिव-नेनिवान्वेशी तर्कशास्त्रकार कोम्रेड शरद पाटिल यान्ना भावपुर्न शिवांजली

इतिहास हा 2 पद्धतीने आभ्यासता येतो
1)जानीवे च्या ब्राम्हनी आन्वेशन पद्धतीने आणि
2)नेनीवेच्या अब्राम्हनी आन्वेशन पद्धतीने .

हे सर्व प्रथम मंडुन इतिहासाचे आनेक न उलगडलेले पैलु सहज उजेडात आननारे महान व्यक्तिमत्व म्हनजे को.शरद पटिल होय .

को.शरद पाटिल यान्नी जगाला निरुती ह्या अद्यगनमातेचा वारसा शोधुन देन्याचे काम सर्वप्रथम केले . आनि जगभरातल्या आनेक देश्यान्नी ते मान्य देखिल केले .वैराज आर्थत शक्त धर्माच्या परुजिवनाच्या शंभुराजे , शिवरायांच्या कार्याला आधुनिक भारतात येकमेव लिखित पाठिंबा देनारे the great शंशोधक म्हनजे को.शरद पाटिल होत . जाती आंताच्या लढ्याचा वर्ग व्यवस्थेत समावेशच होत नाहि हे शिद्ध करुन मार्क्स ची आनेक मते खोडताना त्याना फार त्रास झाला .म्हनुन स्वतंत्र मार्क्स फुले आंबेडकरवाद काढुन भारतात जाती निर्मुलनाचे काम त्याना करावे लागले .आनि महर्शि विठठल रामजी शिंदे सारखे येकाकी राहान्याचे दुख आयुश्यभर त्यांच्या वाट्याला आले .काल (12 ऐप्रिल 2014) ला भारताने येक केवढा मोठा महापुरुश गमवला याचा आंदाज सुद्धा बांधता येनार नही .आलिकड्च्या काळात येकांगी लिखान करनार्या लेखकानी तर समग्र शरद पाटिल वाचलेच पाहिजेत . आणि ज्याना जातिअंताचा लढा लढायचाय त्यान्नी तर 'सपा' ला समजुन घेतलेच पाहिजे .आपली नाळ थेट मात्रसत्ताक ,स्त्रीसत्ताक गण व्यवस्थेशी जोडुन देवुन आपला वारसा पुन्हा आपल्याला परत मिळवुन देन्याचे काम 'सपा' नी केले आहे . नहुशाचे शिल्प हे भारताचे राट्रीय शिल्प व्हावे आशी त्यांची इछा होती .त्यांची मनोकामना लवकरच पुर्ण होवो.

त्यांच्या कार्य कर्त्रुत्वाला हाजारोवेळा सलाम .

Thursday, 15 August 2013

हे स्वातंत्र्य खोटे आहे . ईथे लोकशाही कोठे आहे .


 स्वातंत्र्य मिळून आज जवळ जवळ ६० पूर्ण झाली . काय मिळाले आम्हाला . 

१)मराठ्यांना आरक्षण नाही , मुस्लिमांचे सच्चर कमिशन लागू  नाही , भटक्यांचे रेणके कमिशन धूळ खात पडले आहे . 
२) या देशात ५ लाख शेतकर्यांनी आत्महत्त्या केल्या . तरुण रोज   निराशेतून आत्महत्त्या करतात . 
३) स्त्रिया रस्त्यावर संडासला बसून बसून पोटाच्या आजाराने      तडपून तडपून या देश्यात मारतात . 
४) भूकबळी ज्याला गोंडस शब्दात कुपोषण म्हणतात . त्याचे प्रमाण सेन गुप्ता समितीला विचारा … हजारो बालके जेवायला न मिळाल्याने या देश्यात मारावीत ?


५) खा.ऊ.जा धोरण लागू करून हा देश तर खावून टाकलाच पण बाहेरच्या विदेशी लोकांना सुद्धा विकला हरामखोरांनी .
६)राजमाता राष्ट्रमाता जिजाऊंची बदनामी , दर बाबासाहेब आंबेडकर यांची व्यंग चित्रातून बदनामी , अहिल्यामाई होळकर यांची
बदनामी . ह्या देशाला काही नियमावली आहे कि नाही
७) बायकोला वाढदिवसाला विमाने भेट देण्यारे याच देश्यात , आणि जावयाची लग्नातील बोलनीची अंगठी न देता आल्यामुळे जीव देणारे हि ह्याच देश्यात .
८) १ १ हजार कोटींच्या बंगल्यात राहणारे ह्याच देश्यात आणि फुटपाथवर गाडी मागे घेताना झोपेतच चेग्रून मेलेले ह्याच देश्यात ९) शेतीला चोरून वीज घेतली म्हणून लग्नाला आलेल्या मुलीसमवेत जेल मध्ये जाणारा सर्वसामान्य शेतकरी.आणि कोटींचे घोटाळे करून सुद्धा मोकार फिरणारे राजकीय दरोडेखोर नेते. स्वातंत्र्य कुणाचे .
१०) इंग्रजांच्या काळात शेतीला १३% बजेट होते आणि आता ० % सुद्धा नाही …कस्ले स्वातंत्र्य । — 

स्वातंत्रता कीस गधे का नाम है ।

स्वातंत्रता कीस गधे  का नाम है ।




 साहित्य सम्राट अण्णाभाऊ साठे अपनी एक मुर्गी नाम कि कहाणी में एक सवाल खडा करते है कि "स्वातंत्रता कीस गधे  का नाम है?"
साच मे आझादी किसकी । येह तो ट्रान्सफर ऑफ पावर है । एक विदेशिने(इंग्रेज)जाते जाते दुसरे विदेशी(ब्राह्मण) के हात में सत्ता सोप दी । 1947 को 3%विदेशी ब्राह्मण ,विदेशी अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो गया
हम भारत के 85% मूलनिवासी बहुजन पिछड़ी जात (OBC SC ST और इनमे से धर्मपरिवर्तित ) के लोग आज भी विदेशी ब्राह्मणों के गुलाम है !ये आझादी हमारी नाही है । 'दुनिया का भारत ही एकमात्र ऐसा देश है ,जहा के लोग गुलाम होकर ,गुलामी में भी अपनी आजादी का झूठा जश्न मानाते  है !''

1947 को 3%विदेशी ब्राह्मण ,विदेशी अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो गया
हम भारत के 85% मूलनिवासी बहुजन पिछड़ी जात (OBC SC ST और इनमे से धर्मपरिवर्तित ) के लोग आज भी विदेशी ब्राह्मणों के गुलाम है !!

स्वातंत्रताके अवसर पर खुद को कूछ सवाल पुछो .

१)स्वतंत्रता के दुसरे हि दिन यांनी १६ ऑगस्ट १९४७ को अण्णाभाऊ साठेँजी ने लाखोँ लोगोका मोर्चा निकाल के  ' ये आजादी झुठी है ' ऐसा  क्यू कहा ?

२)आदिवासीँयो ने आज हातो में शस्त्र , हतियार क्यो उठाये है ?

३)राष्ट्रगीत असल में  अर्थ क्या है, सच्च्याई क्यो छुपाई जा रही है  ?

४) हमे जो संविधान ने हक ओर अधिकार दिये थे , ओ क्यू  छिन लिये जा राहे है ?

५)किसान आत्महत्या क्यो कर रहे है ? ऐसी  परिस्थिती किसके वजह से आई ?

६)क्या सच मे  हम आझाद  है ?

Sunday, 14 July 2013

आखिर कौन है ये शिर्डी के 'साईबाबा' , 'स्वामी समर्थ' और शेँगाव के 'गजानन महाराज' ?

ता 19 जुलै 1994 को संपादक दिपक तिलक ईनका सह्याद्री अंक मे दुसरा नानासाहब पेशवा ही साईबाबा है यह लेख प्रसिद्ध हूआ था लेखक अरुण ताम्हणकर ईनोने रहस्योद्घाटन करते हूए एक अज्ञात साधु का आधार लिया है । ऊनका ये लेख दै मुलनिवासी नायक के पास ऊपलब्ध है । ताम्हणकर ईस लेख मेँ जो कहते है ऊसका सारांष तो यही कहता है सदाशिवराव पेशवा ही स्वामी समर्थ हैतात्या टोपे ये शेगांव के गजानन महाराज हैदुसरा नानासाहब पेशवा ही साईबाबा है । लेखक ताम्हनकर को बाबा के प्रकटिकरण मान्य नही वे कहते है कि ये बाबा लोग अचानक प्रकट हूए कैसे? साधारण आदमी के तरह माँ के पेट से जनम क्यो नही लिया? स्वजाति के बारमे अपनने ऊलटा सिधा बोल दिया ईसके लिए ताम्हणकर ने अपना मुँह बंद किया तो कभी खोला ही नही । ब्रामणो ने स्वामी समर्थ महाराज ईनके कई जगह मठ स्थापण किये अक्कलकोट मंगलवेढा चिपलुण अहमदनगर कल्याण दादर गिरगांव (महाराष्ट्र) ईन प्रमुख संस्थानो (मठ) मे स्वामी का प्रकट दिन हर साल मनाया जाता है । और हर मठो मे खालि सिंहासन है । क्यो कि सिर्फ ब्रामण ही जानते है की स्वामी समर्थ ये पेशवा सदाशिवरावही है । ईस प्रकरण का शोध लेने के लिए प्रत्यक्ष कुछ मठो मेँ भी जाकर देखा है । यह लेख किसीकी भावनाओ को ठेच पहूचाने के लिए नही लिखा गया है । सामान्य जनता को ब्रामणी षडयंत्र समजे, गुप्त बाते समजकर अंधश्रद्धा खात्मा हो यही हेतु है ।पानिपत कि तीसरी लडाईता 13 फरवरी 1760 को पटदुर यहा विश्वासराव पेशवा ईनके साथ सदाशिवराव पेशवा को मिशन पर भेजने का निर्णय लिया गया । ग्वालियर होकर ता 30 मई 1760 को तोफ, रसद, बारुद, घोडदल कुछ औरते लेकर सव्वालाख फौज निकली । अहमदशाह अब्दाली चौकन्ना हो गया वह कुशल सेनापती था ऊपर से पेशवाओ मे चालाकी का अभाव था सदाशिवराव ये कुत्सित जिद्दि स्वभाव के थे (ऐसा ब्रामण कादंबरीकारो ने लिख कर रखा है) ता14 जनवरी 1760 को पानिपत यहा लडाई हूई ।विश्वाराव ईनकि गोलि लगने से म्रुत्यु हो जाति है तो सदाशिवराव बच्चो कि तरह रोने लगते है ईससे सैनिको का मनोबल कम होता है । सदाशिवराव को बिना लडखडाए मैदान खडा रहना आवश्यक था । पर अचानक सदाशिवराव मैदान मे से गायब हो गये(म .यु. भा. ईतिहास पेज क्र 112) । ईतिहास मे पाणिपत कि लडाई का वर्णन सव्वा लाख चुडिया तुट गई ऐसा किया गया है । स्वामी समर्थ अचानक ऊसी समय 1760/61 मंगलवेढा (महाराष्ट्र) को प्रकट हूए स्वामी समर्थ के प्रकटिकरण से पाणिपत कि लडाई का घटनाक्रम जुडता है ।पहले तो मंगलवेढा गांव के लोग ऊन्हे नग्न मतिमंद पागल व्यक्ती समजते थे । कुछ सालो में ही ईस तरुण नग्न मनुष्य का दिगंबर बाबा हो गया ।(गांधिजी भि सव्वालाख पट चालाक थे ऊनोने प्राप्त किया हूआ महात्मापन एकनंबर माडल है ।)स्वामि समर्थ का चरित्रई स 1818 को ब्रामण गोपलबुवा केलकर ने स्वामी कि पहलि बखर(Historical document) लिखि । गोपालबुवा ये स्वामी के बहुतसी गुप्त बाते जानने वाले शिष्य थे । ऊसके बाद ता 09 मई 1975 को रामचंद्र चिंतामण ने बखर का पुन:लेखन किया । अनंतकोटी ब्रम्हांडनायक राजाधिराज स्वामी समर्थ महाराज ईनका जनम कहा हुआ?, वो छोटे के बडे कहा हुए ? ऊनके मातापिता कौन ? ऊनकी जाति कोनसी ? ईनमसे कोई भि बातो का पता नही चलता ऐसा बखर मे लिखा है । स्वामि मंगलवेढा मे 12 साल रहे । गांव के लोग ऊनको मतिमंद मनुष्य समजते थे । बसप्पा तेलि के घर मे रहने वाला यह नग्न व्यक्ती सिंदुर लगाए हूए पत्थरो पर पेशाब करता था ।स्मशान मे कबरो पर संडास करता था ।बसप्पा तेलि के घर के चुल्हे मे संडास करता ये सब स्वामी के लिला थे, वे अवतारी पुरुष थे ऐसा बखर कहती है (अंग्रेजो को कुछ ब्रामण साधु सन्यासीयो के जिवन चरीत्र के सबुत मिले एक जानकारी हमारे पढने मे आयी के एक साधु अपने अनुयाईयो को अपनी संडास खाने देता और ऊसके बाद ही ऊसे अपना चेला बनाता )। परंतु बसप्पा कि पत्नी मात्र अपना पती कहासे ईस मतिमंद पगले के पिछे लग गया ईसके लिए दुखी थी । रोजि रोटी करके पेठ भरनेवाला यह तेलि परिवार बहुत ही गरीब मे जी रहा था । अचानक बसप्पा के परिवार को कहासे तो सोने की खान मील गयी और उनकी गरीबी हमेशा के लिए नष्ट हो गयी । असलियत मे स्वामी को मिलने के लिए मालोजिराव पेशवा मंगलवेढा आते थे ।ऊन्होने स्वामी का महिने का खर्चा बसप्पा को देने की व्यवस्थ लगा रखी थी । स्वामी कभी कभी बसप्पा के परिवारवालो को घर से बाहर निकाल देते और दरवाजे के सामने लाठी लेकर बैठते ।पेशवाओसे महिना अर्थसहाय्य मिलने के बाद गणपत चोलप्पा नाम का नौकर स्वामी की सेवा के लिए ऊपस्थित हो गया ।मै टोली तयार करता हूस्वामी मंगलवेढा मे रहते समय ऊन्हे जबभी पागलपन का झटका आता तो ऊने शांत करने के लिए चेले गांव कि मतिमंद स्त्रि सरस्वती सुनारीन को लाते ।यह मतिमंद स्त्रि लाठी और बगल मेँ फटे कपडो का गठ्ठा लेकर चेलो के पिछे भागती एक चेला कहता 'ज्ञानबा तुकारम' अर्थात दुसरा कहता 'पगली का क्या काम' यह शरारत देख स्वामी जोरजोरसे हसते इतना कि ऊनका पलंग भि हिलता ।12 साल रहने के बाद भी स्थीती नही सुधारी । अक्कलकोट मे चिंतोपंत टोल के यहासे एरंडी की सुखी लकडियो के हतेलिभर तुकडे करते । ऊनमे मिट्टि भरते और फिर पाँच पाँच सात सात तुकडे सैनिक बंदुक जैसे रखते है उसि प्रकार लाईन से रखते । ये ऊपक्रम कई महीने चलता किसिने अगर पुछा तो स्वामी कहते मै टोली (पलटन) तयार करता हू ।ऊसके बाद स्वामी अक्कलकोट मे दुसरा खेल खेलने लगे । अक्कलकोट मे लक्ष्मी नाम कि ऐक तोफ है वहा जाकर तोफ के मुंह मे सिर डाल कर घंटो बैठते ।बुधावारपेठ मे बडबडाते 'अब हिंदु का कुछ रहा नही घोडा गया हाति गया पालखि गया सब कुछ गया' और बिचमेही चिल्लाते सरबत्ती लगाव! यह सब पाणिपत की हार का परिणाम तो नही ? आज तक सदाशिवपेठी लेखक पेशवाओ के गुण गाते नही थके । स्वामी , राऊ ईन कादंबरीयो मे 'तोतया' कहके ईसि पागलपण का वर्णन किया है ।जो पेशवा गिरफ्तार हुवा क्या वो पागल था ? क्या वो पागलपण का नाटक करता था ? ऐसा प्रश्न कादंबरी पढने वालो को नही पडा ।


स्वामी एक जगह कभी बैठते नही थे । दिन मे सात आठ बार वो जगह बदलते ईसिलीए ऊन्हे चंचल भारती भी कहते । अक्कलकोट मे स्वामी के स्वतंत्र आश्रम की व्यवस्था की गयी थी । ईस काम मे राणी साहब बहूत ज्यादा ध्यान देती । ईस प्रकार ब्रामणी खोपडी ने मतिमंद सदाशिवराव का स्वामी समर्थ महाराज किया था ।स्वामी के दर्शन से हमारे तूम्हारे प्रश्न छुटते है , भाकड गाय दुध देती है , स्त्रियो को बच्चे होते है । ऐसा प्रचार अडोस पडोस के गांवो मे किया जाता प्रचार मे ब्रामण स्त्रियो का भी सहभाग रहता । पेशवाओ के दफ्तर के दस्तावेजो के प्रमाण से पता चलता है की ब्रम्हेंद्रस्वामी धावडशिकर ये स्वामी के भेस मे शाहूकार और बद्चलन आचरण के थे । ब्रंम्हेँद्रस्वामी के पास लगभग 20 स्त्रि दासिया थी । जहा जहा स्वामी रहते वहा वहा स्त्रि दासिया जाती । ऊनमेँसे कुछ प्रसिद्ध दासियो के नाम ईस प्रकार से है सजनी, गंगी, सोनी, लक्ष्मी, मानकी, नागी, राधी, गोदी, नथी, कृष्णी, यशोदा, नयनी, आनंदी, ई . ये सभी पेशवाओ कि तरफ से नजराणा था ऐसा जानकारो का कहना है । ईतनाही नही जिनको पुत्रप्राप्ती नही होती थी ऊनको स्वामी के पास लाया जाता और ऊनको स्वामी का विशिष्ट प्रसाद दिया जाता । कुछ रातो को तो स्वामी के मठो से अनैतिक मार्ग से पुत्रप्राप्ती की जाती । ईस सारे खेल पर पेशवाओ के जबरदस्ती कि वजह से परदा पड जाता । यही रित स्वामी समर्थ कि थी ऐसा दस्तावेजो के आधार पर प्रमाणीत किया जा सकता है ।
' मुंगी पैठण की विठाबाई '
स्वामी के दर्शन को भक्त आने लगे आश्रम मे गाय, बकरी, कुत्ते, बिल्लियो की संख्या बढने लगी । केशर कस्तुरी के मिश्रण करके पेशवाओ की तरह सीर पर गंध लगाया जाता स्वामी कभी दाढी रखते कभी निकालते वे लहरी स्वभाव के थे ।स्त्रीयोँ के सत्र मेँ पुरुषो को प्रवेश नही था । स्वामी को कभी कभी साडी चोली पहनाकर बिठाया जाता पर स्वामी अधिकतर लंगोठ पहनकर बैठना पसंद करते । मुंगी पैठणकी विठाबाई ये भि स्वामी की दासी थी । एकबार ऊसने चोलप्पा गणपत को साथ मेँ लेकर पंढरपुर जाने का विचार किया । स्वामी को ये समजने के बाद स्वामी ने सबके सामने उसको पुछा की क्या ? अब तक विठोबा का लिंग पकडने नही गयी ? यह सुनकर वहा ईकठ्ठा हूई सभी औरतो ने शर्म से गर्दन निचे कर दी (स्वामी समर्थ बखर पेज क्र. 46)।
" सुंदराबाई प्रकरण "
दिन ब दीन अक्कलकोट मे भक्तो कि संख्या बढती गयी वैसे संस्थान मे पैसो की आमदनी भी बडी । उसी दौरान सुंदराबाई नाम की तरुण विधवा स्वामी की दासी बन गयी ।वो गणपत चोलप्पा बालप्पा ईनको आदेश देने लगी । तो स्वामी ऊसको कहते " ऐ रांड नौकरणी ये क्या तेरे घर के नौकर है ? "। स्वामी खाना खिलाना नहाना दर्शन के लिए तयार करना ये सभी काम वो करती ।ऊसने स्वामी को ऊठने को कहा तो वो उठते सोने को कहा तो सोते ।ईतनाही नही भक्त दर्शन के वक्त सुंदरा स्वामी को पत्नी कि तरह चिपककर बेठने लगी । संस्थान का अनगिनत पैसा सुंदराबाई हडप करने लगी ।तक्रार करने पर शिष्यो ने ऊसे जेल मे डाल दिया ।
स्वामी अवतार थे पर स्त्रिलंपट थे आखिर मामला पोलीसो तक पहूचना जरुरी था , स्वामी समर्थ के अवतारवाद पर प्रश्नचिन्ह खुद स्वामी ने ही लगाया ।ये अवतार न होकर पाखंड था ये सिद्ध हो चुका है ।
स्वामी की बखर मे 264 प्रकरण है वह सभी देणा शक्य नही । एक बार कर्वे नाम का ब्राम्हण स्वामी को मिलने आया कर्वे ईनकी जवान लडकी बिघड गयी थी । स्वामी ने कहा " होली किजिए " कर्वे को बडा ही धक्का पहूचा तो ऊनोने पुछा आपकी जाती कोनसी ? तो स्वामी ने जवाब दिया " यजुर्वेदी - ब्रामण, गोत्र- कश्यप , रास - मिन " (स्वामी समर्थ बखर पेज क्र 58 ) । ई स 1800 को स्वामी की मृत्यु हो गयी स्वामी तब वे सत्तर साल के थे । ई स 1800 मे चैत्र शुद्ध पुर्णीमा को ऊनका मृत्यु हूआ स्वामी की प्रेतयात्रा को हाती सचाये हुए घोडे तोफदार जरिपटका के पेशवे निषाण बारुदकाम करने वाले ऐसा माहौल था । स्वामी पर भरजरी पोशाख व अलंकार चढाए गये । स्वामि को आखिर मेँ सुगंधी पेटी मे बंद किया गया ऐसा बखर मे लिखा है .


परंतु 14 जनवरी 1761 को मैदान से भागे हुए सदाशिवराव का अंत हुआ था ।स्वामी मंगलवेढा मे रहते समय पेशवाऔ की तरफ से उनको मिलने वाला खर्चा कभी बंद नही किया गया स्वामी ने एक बार मालोजिराव के गाल पर थप्पड लगाई ऊसका कारण यही था कि सदाशिवराव ही स्वामी समर्थ थे । आगे यही प्रयोग तात्या टोपे और नानासाहब पेशवा के साथ किया गया । क्योकी ब्रामण मतिमंद पागल आदमी को स्वामी समर्थ बना सकते है तो सिर से पैरो तक ठिक ठाक दिखने वाले तात्या टोपे को गजानन महाराज और नानासाहब पेशवा को शिर्डी के साईबाबा क्यो नही बना सकते ?
" तात्या टोपे ही है गजानन महाराज "
1818 को भिमा कोरेगाव पेशवाओ की हार हुई ।भारत मे अंग्रेजो कि सत्ता प्रस्थापित हूई । अंग्रेजो के विरुध कयी लड़ाईया हुई उनमेसे 1857 की लड़ाई एक संगठित प्रयास था । परंतु तात्या टोपे, नानासहब पेशवा , लक्ष्मीबाई ईनके नेतृत्व मे किया गया यह प्रयास असफल साबित हुआ । हारने के बाद ये लोग भूमिगत हो गए । नानासाहब पेशवा तात्या टोपे रंगो बापुजी ये लोग साधु पंडीतो का भेस धारण कर भटक रहे थे ('रंगो बापुजी' लेखक-प्रबोधनकार ठाकरे-(शिवसेना के बाल ठाकरे के पिता), पान क्र 270) कई लोगो को फासी दि गयी पर परंतु ऊनके रिश्तेदारो ऊनकी लाश पहचान से ईनकार कर दिया । करीब एक साल पहले कि बात है दैनिक जागरण मे एक व्रुत्त प्रकाशीत हूआ है , तात्या टोपे को फासी दि गई पर वो कोई दुसरा ही था , ऐसी खबर है । लेखक ताम्हणकर का कहना है की तात्या टोपे का वर्णन शेगांव के गजानन महाराज से मिलता जुलता है ,शेगांव मे प्रकट होने वाले गजान महाराज तात्या टोपे ही है ऐसा उनका स्पष्ट कहना है ।साईबाबा और गजानन महाराज एकही वक्त मे होके गए । दोनो को चरित् मे दोनो की कभी मुलाकात होने की खबर नही मिलती ।परंतु जब गजानन महाराज का मृत्यु हुआ तो इधर साईबाबा ' मेरा गया रे ' कहकर दुःख व्यक्त कर रहे थे । असल मे ये लोग संत महापुरुष थे ही नही ब्रामणो ने बनाए हुए बेहरुपीये थे । सुख दुःख के भी आगे निकल चुके संतो से तो ये अपेक्षीत नही की वे अपना सेनापति मरने का दुःख जाहिर करे पर इसका दुःख नानासाहब को हुआ । ' सांईबाबा मतलब दुसरा नानासाहब पेशवा ' !
साई यह नाम इसा से लिया गया है ।
केसरी प्रकाशन ने प्रकाशित किया गया ' पेशवा घराणो का ईतिहास ' ईस किताब मे लेखक प्र ग ओक कहते है दुसरे बाजिराव ने 7 जुन 1827 को गोविंद माधवराव भट ईस लडके को गोद लिया । उसकी जनतारिख 6 दिसंबर 1824 ऐसी है । मतलब 1857 के युद्ध मे दुसरे नानासाह पेशवा 32 साल के थे ।
नानासाहब पेशवा को संस्कृत , पर्शियन(ईराणी) , ऊर्दू ईन भाषाओ का ज्ञान था । नानासाहब पेशवा हमेशा किनरवापी कुर्ता डालते । शिर्डी के साईबाबा का द्वारकामाई चावडी के पास का फोटो सबके परिचय की है ।
28 फरवरी 1856 को अंग्रेजो ने नानासाहब पेशवा को पकडने के लिए इनाम जाहिर किया था । रंग गेहुआ , बडी आंखे , छह फिट दो इंच लंबाई, सिधा नाक, साथ मे तुटे कान का नोकर ऐसा भेस जाहिर किया गया था । नानासाहब समझ कर दूसरे किसीको ही फासी दी गई थी । असल मे नानासाहब कबके फरार हो चुके थे । साई यह गांव मै जहा पे पढता हू ऊधर रायगड जिले (महाराष्ट्र) के चिरनेर के पास है । परंतु साई यह नाम ब्रामणो ने येशु ख्रिस्त के ईसा का उलटा लिया है ।
ब्रामण मतिमंद पागल सदाशिवराव को स्वामी बना सकते है तो नानासाहब पेशवा को शिर्डी का साईबाबा भि बना सकते है ।ईन स्वामी बाबा महाराजाओ को लोगो को गाली देने कि आदत थी । और स्वामी समर्थ और साईबाबा ईनकी काठी एक जैसी ही है । और काठि पर हात रखने का तरीका भी एक जैसा है यह विशेष।
ओर दुसरी विशेषता तो यह है की इनको कई तरह की गंदी आदते भी थी उनमे से एक गजानन महाराज की गांजा पिते हूए एक तसविर बहुत लोकप्रिय है ।अय्याशीयो से ही गांजा पीने की आदत लगती है ।
मुलनिवासी बहूजनो के संत मोह, माया, संपत्ती से दुर रहकर लोगो को जिने का मार्ग दिखाते । ' व्रत काया कल्पो से पुत्र होती, तो क्यो करने लागे पती ' । यह भावना विज्ञानवादी विचारधारा का ऊदाहरण है । चिलिमधारी गांजाधारी फोटो का मानसशास्त्रिय परिणाम छोटे बच्चो तथा समाज पर क्या होता होगा ?।वर्तमान मे जो काला पैसा कमाते है , भाईगिरी , चोरी खुन करके पैसा कमाते है , बडे बडे गुंडो के आश्रय से राजनिती मे आते है । 'चरीत्रहीन काम करके मै ही चरीत्रवान ' ईसलिए दर्शन के लिए बिना किसी लाईन मे लगके दर्शन के लिए ज्यादा का पैसा देकर शार्टकट दर्शन लेते है । अमिताभ बच्चन का दर्शन घोटाला तो बडा ही फेमस है । बाल ठाकरे ने भि साईबाबा को क्या क्या नही दिया था यह प्रकरण भि बडा ही फेमस हूआ था । काँग्रेस, राष्ट्रवादी , बिजेपी के नेताओ ने पुंजिपतियो ने कितना पैसा ईन मंदिरो को दिया ईसका कोई हिसाब है ? । यह राजस्व प्राप्त करने का नया तरीका है क्या ? भारत को आजादी मिलने के बाद संस्थानिको के संस्थान विलीन किए गए बदले मे उनको तनख्वा देने कि व्यवस्था कि गई कुछ दिनो बाद भारत सरकार ने तनख्वा बंद किया । ऊसके बाद संस्थाने राजापद इतिहासगत हो गई । परंतु आजादी के बाद अस्तित्व बनाए रखने वाली ब्रामणी व्यवस्था की संस्थाने गब्बर होती जा रही है । इन संस्थानो के आश्रय से अंदर बैठने वाले बुवा , बापु , बाप्या , स्वामी, दादा, नाना-महाराज, सद्गुरू इनकी कृपा से हमारे तुम्हारे प्रश्न चुटकी बजाते ही छुट जाएंगे ऐसा प्रचार यह ब्रामण और ऊनके दलाल हमेशा करते रहते है । धर्म , भक्ती, सेवा, श्रद्धा, अध्यात्म, ब्रामणी कर्मकांड ईनको आकर्षित होकर खुद ही ब्रामणी संस्थानो मे प्रवेश करते हैँ । नसिब पर विश्वास रखकर जिने लगते है । दैववादी बन जाते है । ब्रामणी कर्मकांडो के जाल मे फस चुके लोगो का कर्मवाद पर से विश्र्वास कम होते जाता है ओर वो ब्रामणो का मानसिक गुलाम बन जाता है। ईनमे अशिक्षित शिक्षितो के साथ अमिर गरीब सभि का जमाव रहता है ।
विशेषता तो यह है की मानसिक विकलांग लोग खुद को ब्रामणी व्यवस्था के गुलाम कभी नही समझते । ईसकी कल्पना तक नही करते ।

गुलामी की बेडीया तोडने का काम तो दुर ही ।ईन संस्थानो मे श्रद्धा के नाम पर लोगो से पैसा निकालने की योजनाए बनाई जाती है ।काकड आरती, महाआरती ,पालखी , ऊत्सव ,अभिषेक ,दर्शन ऊत्सव ,बेडिया, व्रत, मृतआत्माओ को खुश करना, चुटकी बजाते अमिर होना ,गुप्तधन, दिर्घायुष्य माला ,होम हवन ईन सब के द्वारा वो आपके जेब मे हात डालते हैं। इसतरह करोड़ो रुपयो का निधि रोज के रोज संस्थानो की दानपेटीयो मे झरने समान गिरते रहेगा ऐसी ब्रामणी षडयंत्रकारी योजना है । भारत के वित्तिय बजट से दस गुणा ज्यादा रकम मंदिरो मे हर साल जमा होती है, वो कहा जाती है । जहा पे भुखमरी से लोग मर जाते है , किसान आत्महत्या करते है , वही पे होम हवन करके लाखो रुपयो का दूध , दही , घी ,अनाज जलाया जाता है । यही इस देश की दुविधा है ।
जिन पेशवा ब्रामणो ने छत्रपति शिवाजी महाराज को जहर देकर मारा वही ब्रामण पेशवा अर्थात साईबाबा, गजानन महाराज, स्वामी समर्थ हमारे प्रेरणास्त्रोत कैसे हो सकते है ? जिन पेशवा ब्रामणो ने अछुतो के गले मे मटकी बाँधकर उनका थुकना तक पाप होता है ऐसा माना , उनके पैरो के निशान भी जमीन पर नही दिखने चाहिए इसके लिए उनके कमर को झाडु लगाया , ऐसे लोगो को हम अपना प्रेरणास्त्रोत कैसे मान सकते है ? फुले , शाहू , आंबेडकर ईनोने जो 108 साल जो क्रांतीकारी संघर्ष किया , जिससे गले की मटकी दूर होके उसके जगह टाई आ गई । शरीर पर कोट, सुट अच्छे कपड़े आ गए । पैरो मे जूते आ गए । जिन ब्रामणो ने ओबिसी को शुद्र कहा आज लोकतंत्र मे वही ब्रामण राजा बने हुए है ।
मुलनिवासी बहूजनो ने अपने महापुरूषो को प्रेरणास्थान मानना चाहीए । अपने बाप को ही बाप मानना चाहीए ।
पेशवा ये विदेशी युरेशियन ब्रामण है । वे अंग्रेजो से झगडते वक्त हार गए और भाग गए अंग्रेज पकड़ेंगे इस डर से ईन लोगो ने दूसरा मार्ग अपनाया वो मतलब साधु , स्वामी बनना । शिर्डी के साईबाबा - दुसरा नानासाहब पेशवा , स्वामी समर्थ -सदाशिवराव पेशवा , गजानन महाराज - तात्या टोपे ये सभी पेशवा ब्रामण है यह इतिहास से सिद्ध हो चुका है ।
इन संस्थानो के मेडिकल इंजिनिअरींग काँलेजेस है । यहा पे ब्रामणो के बच्चे पढते है और बाद पास होने के बाद इन विध्यार्थीयो से दो साल के लिए पुर्णकालिन कार्यकर्ता बनाकर काम करवाया जाता है ।आगे यही विध्यार्थी ब्रामणी व्यवस्था के कट्टर समर्थक कार्यकर्ता बनकर ब्रामणी व्यवस्था का मेंटेनन्स करने का काम करते है ।

यह लेख मराठी दै मुलनिवासी नायक मे आया हूआ है ।पाठको कि निरंतर मांग के कारण ईसे बार बार प्रकाशित किया गया ।दै मुलनिवासी नायक ने ईन तिनो ब्रामणो को नंगा किया तबसे कुछ महाराष्ट्र के ब्रामणी चँनलो ने अनैतिक टिवी सिरिअल्स शुरु कीये । महाराष्ट्र मेँ तो यह लेख गांव गांव मे पहूच चुका है । ईसिलिए पुरे देशभर के मुलनिवासी साथीयो को जाग्रत करने के लिए ईसका हिंदी अनुवाद किया हू । ईसको ध्यान मे रखते हूए सभि मुलनिवासी साथियो से विनती है की ईसे ज्यादा से ज्यादा मुलनिवासी साथियो के साथ शेअर करे और हो सके तो ईसकी प्रिँट निकाल कर लोगो मे ईसकी प्रतिया बाट सकते है । जल्द ही ईस पर मुलनिवासी पब्लिकेशन ट्रस्ट कि तरफ से एक शोध पुर्ण ग्रंथ प्रकाशित होने वाला है ।

Thursday, 11 July 2013

भारत में बम विस्फोट कौन करता है ? मुसलमान या ब्राह्मण

भारत में बम विस्फोट कौन करता है ? मुसलमान या ब्राह्मण 

1- मालेगाँव का बम विस्फोट-लेफ़्टिनेंट कर्नल श्रीकांत, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर,
2- अजमेर दरगाह का बम विस्फोट-स्वामी असीमानंद , इंद्रेश कुमार (आरएसएस के वरिष्ठ नेता), देवेंद्र गुप्ता, साध्वी प्रज्ञा सिंह, सुनील जोशी, संदीप डांगे, रामचंद्र कलसांगरा उर्फ रामजी, शिवम धाक़ड, लोकेश शर्मा, समंदर , योगी आदित्यनाथ. 
3- मक्का मस्जिद का बम विस्फोट-स्वामी असीमानंद एन्ड कंपन
4- समझौता एक्सप्रेस का बम विस्फोट-स्वामी असीमानंद एन्ड कंपनी
5- नांदेड बम विस्फोट-संघ कार्यकर्ता राजकोंडवार तथा नकली दाड़ी और शेरवानी , कुरता , पायजामा भी बरामद
6- गोरखपुर का सिलसिलेवार बम विस्फोट- अज्ञात - आफ़ताब आलम अन्सारी है- गिरिफतार किया व ब ईज्जत रिहा
7- मुंबई ट्रेन बम विस्फोट - अज्ञात क्योंकि मुस्लिमों को फंसाया नहीं जा सका
7- घाटकोपर में बेस्ट की बस में हुए बम विस्फोट- अज्ञात क्योंकि मुस्लिमों को फंसाया नहीं जा सका .
8- वाराणसी बम विस्फोट-अज्ञात क्योंकि मुस्लिमों को फंसाया नहीं जा सका .
9- कानपुर बम विस्फोट-बजरंग दल कार्यकर्ता भूपेन्द्र सिंह छावड़ा और राजीव मिश्रा
10 पाकिस्तानी कसाब -जिम्मेदार भारत सरकार क्योंकि उसे 15 दिन पहले से जानकारी थी -कमिश्नर मुश्रीफ का बयान .

    अगर मुसलमान बंबविस्पोठ करते है , तो मस्जीत मे क्यू करते है। ओर बंब गिराने पर उस जगह दाढी टोपी क्यू डाल के जाते है । टोपी गिर जाती होंगी या बात ठीक है मगर दाढी … 

हमारे परभणी मे मस्जीत मे बंब गीराया गया था, पगले है मुसलमान उन्हे कोई ब्रह्मणो का मंदिर न मिला । 
नांदेड मी तो बंब बनते समय फुट गया उसमे २ ब्राह्मण मर गये ओर २ पकडे गये । उस जगह ओर क्या मिल पता है, टोपी ओर नकली दाढी के बक्क्षे । हाय रे इंडिअन मुजाहिद्दीन …. उसमे तो सारे कुलकर्णी ,पुरोहित , शुक्ला , गुप्त , जोशी , प्रज्ञासिंग वा । इंडियन मुजाहिद्दीन नाम का कोई संघटन भारत में है हि नही । जिसका न कोई संस्थापक , न कोई सदस्य ।
ये तो चालबाजी है ब्रह्मणो कि मुसलमानो के खिलाफ भडकाणे कि ।

Friday, 5 July 2013

जिनके पिछवाडे पे लात मारणी चाहिये उनके हम पैर छुते है,



कहा का रिवाज है जिसे जिते जी तन ढकनेको चीथडा न मिले उसे मरणे के बाद यक नाय कफ़न चाहिये । 
कहा का रिवाज है यह कि गरजू ,लाचार गरीब को लाथ मारके पथरो पे मत्था टेकणे को कहा जाता है । 
कहा कि संस्कृती है यह जहा गुलाम बनानेवाले , पुरा घर लूटकर ले जाने वाले के दक्षणा देकर पैर छुये जाते है। अरे  जिनके पिछवाडे पे लात  मारणी चाहिये उनके हम पैर छुते है,
कोनसा धर्म है यह जो असमानता ,गैरबराबरी , भेदभाव , उचनीचता शिखाता है । 
जो धर्म ग्रंथ अश्लील गलीया देते है , नारी को केवळ पिटणे के लायक मानते है । 
उसे हम बडे मजे से सर पे लेके उत्सव मना रहे है । कोई नही झाकणा चाहता ग्रन्थो के अंदर । ओर कोई झाकणे भी नाही देगा क्युकी सच्चाई बहार आ जयगी । बडे मजे से नोटंकी चाल रही है धर्मपुरोहित ,पंडो कि , गुलाम बना के नचा रहे है औरतोंको , पैसे मागकर लुट रहे है अदमियो को । बस चल  रहा है  बरसो से यह खेल ।  कोई तटस्थ खडा है, तो कोई लुटणेवालो साथ दे रहा है । चुप्पी छाके सत्य  ने मॊन धारण कर लिया है , खाली दोचार हि अपनी रट लगाये जाते है हर युग मे , हर शतक हर दशक मे । इनमे 
कोई शिव होता है तो कोई बुद्ध ,
कोई महावीर होता है तो कोई गुरुनानक ,
कोई मसीहा येशु तो कोई पैगंबर साहेब । यहा गुनाह १ क हि कि सत्य नही बोलना , सत्य बोलोगे तो सजा मिलेगी 

सत्य बोलणेवालो को इस विश्व मे  क्या मिला 
येशु के हात पैरो मे किले  ठोक ठोक के मार दिया धर्म के ठेकेदारो ने .
छ संभाजी महाराज कि आखे निकालदी ,  धर्मग्रंथ क्यू पढे इन आखो से  इसलिय  ,
उंगलिया , नाखून क्यू लगाये ब्रह्मणो के रद्दी ग्रन्थो को इसलिये नाखून निकाल के उंगलिया काट  दि गई युराज शंभूराजा कि । 
 उच्चारण किया संकृत श्लोकोका तो निकाल जी गयी जिव्हा उनकी मुह्से ।   
फिर भी यहा के  देशी गुलाम चूप ओर विदेशी शैतान मजे मे नाच रहे है सतसांगो मे । 
इतना हि नही संत रविदास, संत कबीर , गुरु गोविंद सिंग  कि हत्त्या कि गयी ब्रह्मणो के द्वारा ,
संत नामदेव से लेकर संत तुकोबाराय  तक सारे संतो कि हत्त्या कि गई ,
बोद्ध भिक्कुओ के करोडो सर काट  दिये गये , पुष्यमित्र नाम के ब्राह्मण ने । 
औरतो को तक नाही छोडा इन हरमियो ने ।  संत मीराबाई को जहर देके कृष्ण मंदिर मी मार दिया …सन्त जनाबाई को सुली पे लटका दिया । क्या अब भी नही जागना चाहते मेरे भाईओ ,
अभी नाही तो फिर कभी नही कभी नही ।  

Friday, 28 June 2013

धर्म के नाम पे पशुहत्त्या कोण करते है ?...

  मित्रो ब्राम्हणो के द्वारा हमेशा ही प्रचार किया गया है कि जीव हत्या पाप है। जीवो पर दया करनी चाहिए...इनकावध नही करना चाहिए तथा जीव हत्या के विषय पर मुसलमानो का हमेशा ही विरोध करते हैँ। परंतु मामला जीव हत्या का नहीं है... बल्कि मामला पिछड़ी जातियों को मुसलमानों से लड़ाने का है, ब्राह्मण जात जानवरों के वध के मुद्दे पर पिछड़ी जातियों को मुसलमानों से लड़ाना चाहते है... जानवरो की बली को तो खुद ब्राह्मणों ने शुभ कार्य के रूप में अपने धर्म की किताबो में डालकर रखा हुआ है। जिसे ब्राह्मण हजारो सालो से शुभ मानते थे तथा देवी देवताओ के सामने बली देते आ रहे है। फिर आज अचानक जीव हत्या पाप कैसे हो गया...
ये ब्राम्हणो कि धूर्तता का अतिउत्तम उदाहरण है। स्वँय जानवरो का वध करते है तो वो देवी-देवताओ को प्रसन्न करने का साधन बन जाता है यदि कोई दुसरा करता है तो वो निर्दयी, क्रुर, हिंसक प्रवत्ति का मनुष्य बन जाता है।  उन्होने हजारो सालो सें यग्य मे करोडो गाय ,भैस , बैल कि बळी चढाई । ओर आज भी धर्म के नाम पे पाखंडी ब्राह्मण गो मांस खाते है ।  वेदो मे मधुपर्क नाम का शब्द आता है जिसका अर्थ होता है गाय के मांस का गुलाबजामून … जिसे ब्राह्मण यग्य के समय घी मे ताल के खाते थे ।
वाह रे...पाखंडीयो तेरि और तेरे भगवान कि लीला अपरमपार है। जिसे समझना मुश्किल हि नही नामुमकिन है।

Friday, 14 June 2013

हिंदी चित्रपटांतून ब्राम्हणी व्यावेस्थेला काय संदेश द्यायचा आहे .?


भारतीय मेडिया हा  ब्राह्मणांच्या ताब्यात असल्यामुळे ते सतत या मेडीयाचा गैर वापर करून क्रमिक असमानता प्रस्थापित  करत असतात . मेडीयाचा वापर आजकाल भांडणे लावण्यासाठी राजरोसपणे केला जातो . 

हिंदी चित्रपटांचेही अगदी असेच वृत्त -वैक्कले , बुवाबाजीचा प्रचार हिंदी चित्रपट सतत करत आहेत ."कार्वाचोत का व्रत " हा तर ठरलेला सीन . बायकोने दिवसभर बिना  अन्न पाण्याचे उपासी राहायचे आणि रात्री नवर्याचे चाळणीत तोंड पहायचे . हा सन आमचा आहे का ?  बरे बायकांनीच उपासी राहायचे का ? नवर्यानी का नको ? हा तर मनुस्मृतीचा नियम झाला . 
हिंदी चित्रपटातील लग्न तर भटांशीवाय लागतच नाही ? काय लग्नाच्या दुसर्या पद्धती उपलब्ध नाहीत  काय ? आणि  सिरीयालीत तर घरात भले मोठे देवघर दाखवले जाते आणि त्यात घनटा  घनटा  सामुहिक पूजा दाखवली जाते . हिरो हरला ,थकला कि मग मंदिरात जातो आणि देवाला शिव्या घालतो मग देव त्याला  प्रसन्न होतो . हा दैववादीपण आजच्या विज्ञान युगात तरुणांना शिकवून हा देश ब्राम्हणांना कुणीकडे घेवून जायचा आहे . 
विलन ,खलनायक महटले कि दाढी ,टोपीवाला मुसलमान आलाच , विलन म्हनुन नेहमी मुस्लिमांची नवे बदनाम केली गेली . कधी ब्राह्मण विलन म्हणुन दाखवला गेला का?
पण कमिशनर ,police इन्स्पेक्टर महटले कि मग पांडे , चतुर्वेदी , गुप्ता ,शुक्ला , कुलकर्णी हि सगळी ब्राह्मण मंडळी , आणि कमिशनर ,police इन्स्पेक्टरच्या हाताखाली  काम करणारे हवालदार म्हटले कि मग जाधव , कांबळे , सावंत असली नावे . हे सगळे  नाटक आमचे लोक पैसे देवून बघतात . मराठी चित्रपटांतून पाटील बदनाम केला गेला . निळूफुले आणि पाटील हे ठरलेले समीकरण त्यात बलात्कार आलाच . 
कॉलेज जीवनावर जेव्हा चित्रपट येतो तेव्हा त्यातील हेरो हा मोकार टूक्कार  बाहेर फिरणारा दाखवला जातो . त्याला मग एखादी प्रेमिका मिळणारच मग सुरु कॉलेज  आणि शिक्षणाचा कचरा . 
म्हणजे आमच्या तरुणांनी देखील असेच वागावे .  बोटावर वही फिरवत कोण्या तरी पोट्टीच्या मागे लागायचे असल्या प्रकारामुळे कितीतरी आमची तरुण मुले मार खावून , शिक्षणाला हात धुवून घरी बसली . 
बंदूक , चाकू असले हत्त्यारे  नेहमी वापरताना हिरो दाखवला जातो . पोरानो तुम्हीपण असेच करा . कायदा मोडा … पुलीसांचे ठरलेलेच आहे ते उशीरच येणार सर्व झाल्यावर. कायदा , पुलीस हे काही न्याय देवू शकत नाहीत मग हिरो कायदा हातात घेतो . कोर्टात जज ला शिव्या देवून न्यायदेवतेचा अपमान करतो वगेरे वगेरे …   हे पण चित्रपटांतून नेहिमी दाखवले गेले . कायदा बदनाम केला गेला .  आम्ही गप्पच . ब्राम्हणांची चित्रपट बघण्यात  गुंग। 

Tuesday, 11 June 2013

परवा परवा मुंबईमध्ये बी .जे .पी . काँग्रेसची दंगल झाली



परवा परवा मुंबईमध्ये बी .जे .पी . काँग्रेसची दंगल झाली, का झाली, कशासाठी झाली, कारणं परंपरा हा भाग वेगळा,... पण त्या दंगलीचा फायदा उठ्वून, एका काँग्रेसच्या मोहल्ल्यामध्ये काहि गुंड होते आणि त्याच काँग्रेसच्या मोहल्ल्यामध्ये एन पंचविशितली एक लावण्यखणी सोनिया नावाची युवती होती. देखणी,.... आरसपणी.. बस बघावं आणि बघतच रहावं इतकी लावण्यखणी, या गुंडांचा तिच्यावर डोळा होता, दंगलीच्या कल्लोळाचा फायदा उठ्वावा आणि त्या युवतीची आब्रु लुटावी......असा बेत त्यांनी आखला आणि दंगल एन जोमात असतानाच ,रात्रिच्या बारा साडे बारा वाजता काळोख चिरत हे सगळे त्या युवतीच्या घराच्या दिशेने सरकू लागले..........
बघता बघता दरवाजावर धड्का पडू लागल्या , आतली ती बावरली..... शहारली........घाबरली,
खिडकितुन बघितलं.... गुंड दिसले... इरादा ध्यानी आला तसे जिवाच्या आकांताने धावत सुटली.
मुंबईच्या रस्त्यावरुन रात्रिच्या बारा साडे बारा वाजता बेभानपणे पळतेय. गुंड पाठलागावर आहेत, तिला कळून चुकलं....या गुंडांच्या तावडीत जर सापडलो तर आपल्या आब्रुची लक्तरे ईथे रस्त्यावरच टांगली जातील,म्हणून बेभान पळतेय जिवाच्या आकांताने काळोख चिरत धावतेय.....धावता....धावता एका बोळात
शिरली बोळातल्या एका घरात तीला उजेड दिसला धपापत्या उरानं दारापुढं आली.... दार ठोठावलं दार उघडलं गेलं.....दारात उभा होता एक एन तिशीतला एक बी .जे .पी .चा हिंदु युवक नाव अटलजी .
दारात सोनिया पाहीली त्याला आश्चर्य वाटले. बाहेर दंगल चाललीय बी .जे .पी . काँग्रेसची. हि कॉंग्रेस ची मग या बी .जे .पी .च्या दारापुढं कशी?.....
त्याने विचारले "काय हवयं?"
ती युवती सोनिया म्हणाली " काही बी.जे.पी. चे गुंड माझ्या पाठलागावर आहेत, एका रात्री पुरता मला आसरा मिळेल का? माझी आब्रु लुटायचा बेत आहे त्यांचा."
हा युवक म्हटला "निश्चिंत आत ये घर तुझच आहे" तिला आत घेतलं, स्वतःच अंथरुण्-पांघरुन दिलं आणि सांगितलं "शांत झोप इथ तुला कसलीही भिती नाहि, मी स्वता: दाराशी राखण करीत राहतो रात्रभर.. ते गुंड परत येणार नाहित तुला त्रास दयायला."
ती युवती युवती झोपी गेली, हा दाराशी राखण करीत बसला, पण राखण करता करता डोक्यात विचार आला.... बाहेर दंगल चाललीय बी .जे .पी . काँग्रेसची हि मुलगी सोनिया कॉंग्रेस ची मी अटलजी बी .जे.पी. चा . मग या बीजेपी च्या घरात तिने आसरा मगितलाच कसा?.....तिला भिती नाही का वाटली?..... आणि ते गुंड तिची आब्रु लुटाण्यासाठी तिच्या मागावर आहेत..... मि ही घरात एकटाच आहे, मी हि तरुण आहे,
मनात आणलं तर ...आता... याक्षणी....इथच... या युवतीची आब्रु मि लुटु शकतो, हिला माझ्या तावडीतून वाचवणारं देखिल कोणी नाही......मग कुठ्ल्या भरवशावर ती माझ्या घरात निश्चिंत पणे थांबलीय?
रात्रभर विचार केला उत्तर मिळलं नाहि..... सकाळ झाली ति युवती जायला निघाली जाताना तिनं आभार मानले.........पण न रहावून याने विचारले
"बाहेर दंगल चाललीय बी .जे .पी . काँग्रेसची तू कॉंग्रेसची मी बीजेपी चा मग माझ्या घरात आसरा कसा मगितलास ? ते गुंड तूझी आब्रु लुटाण्यासाठी तूझ्या मागावर होते...पण मि ही घरात एकटाच होतो........ मी हि तरुण होतो...........मनात आणलं तर रातोरात तुझी आब्रु मि लुटु शकलो आसतो........तूला माझ्या तावडीतून वाचवणारं देखिल कोणी नव्हतं ......मग कुठ्ल्या भरवशावर ती माझ्या घरात थांबलीस?
त्यावर ती युवती म्हणाली "त्या गुंडांच्या तावडीतून सुटण्यासाठी मी बेभानपणे धावत होती. मुंबईच्या रस्त्यावरुन सैरावैरा पळत होते.......धावता....धावता या बोळात शिरली बोळातल्या तुझ्या घरात मला उजेड दिसला धपापत्या उरानं मी दारापुढं आले.... पण दार ठोठवायच्या अगोदर तुझ्या घराच्या उघड्या खिडकीतून मि आत डोकावुन पाहिलं तर तुझ्या घराच्या भिंतीवर मला.......असमर्थ रामदासाचा फोटो दिसला.........आणि मगच मी दार ठोठावलं................
कारण मला माहिती आहे,... ज्या घरात असमर्थ रामदासाचा फोटो आहे त्या घरात कुणाच्याही आब्रुला धोका नाही.....कारण रामदास छक्का होता ...तो लग्न मंडपातून पाळला होता .

पाहिलतं गेल्या साडे तिनशे वर्षा नंतरही पळपुट्या रामदासा बद्द्ल जनमाणसांमध्ये जी प्रतिमा आहे...ती हिच प्रतिमा आहे
रामदास स्मरणात आहेत ते फक्त एव्हढ्यासाठी.........

Sunday, 2 June 2013

आपली न्याय व्यवस्थाच मुळी अन्याय व्यवस्था आहे .

शिक्षेमुळे कोणतीहि व्यक्ती परिवर्तित झाली नाही.  ऽनि होत हि नाही . उलट होतं काय तर तुरुंग म्हणजे गुन्ह्याची विद्यापीठे होवून बसतात .नवशिके , हौशी गुन्हेगार बाहेर येताना अट्टल ,निडर गुन्हेगार म्हणून बाहेर पडतात . जणूकाही ते पदवी घेवून बाहेर पडलेत . दिलेल्या शिक्षेमुळे त्यांना अनुभवी ,बिनचुक्या गुन्हेगारांचा सहवास लाभतो . आणि मग ते ट्रेन गुन्हेगार म्हनून बाहेर येतात . आणि मग आत शिकलेले फंडे वापरायला लागतात . 
तुरुंगात सुम्पूर्ण वातावरण एकाच गोस्ट  सांगत असते कि चोरी करणे , खून करणे ,बलात्कार , हा काही गुन्हा नव्हे , आपण पकडले जाने हा गुन्हा आहे . तेव्हा पकडले न जाता गुन्हा कसा  शिताफीने कारायचा ते शिकून घ्या . 
आपली सगळी न्याय व्यवस्थाच  मुळी अन्याय  व्यवस्था  आहे . शिक्षा देवून लोकांना सुधारायची कल्पनाच मुळी विचार करायला लावणारी आहे . खरे म्हणजे गुन्हेगारांना इस्पितळात ठेवण्याची गरज आहे . त्यांना मानसोपचार तज्ञाकडे नेले पाहिजे  नाही तर  नैतिक शिक्षण दिले पाहिजे. करुना  दाखवून उपचार केला पाहिजे . शिक्षा म्हणजे त्याच्यावर सूड उगवणे ,त्याच्यावर हि परिस्थिती  का आली हे जाणून घेणे नव्हे . 
ह्या देश्यात केवळ टाटा ,बाटा अंबानी यांसारख्या केवळ पंधरा व्यक्ती श्रीमंत आहेत . हेच खरे दरोडेखोर ,गुन्हेगार आहेत . कुत्र्यांना a .c . आहे यांच्या कडे ,१ १ कोटीचे बंगले . हजारो एक्कर जमिनी यांच्याकडे . हे तर घटना विरोधी आहे . पण कुठे आहे 
न्याय व्यवस्था . गरिबांना ५ २ एक्कर पेक्षा जास्त जमीन बाळगता यात नाही , शेतीला वीज नाही , गरिबांना न्याय नाही ….

Tuesday, 21 May 2013

मनुस्मृती,ज्ञानेश्वरी आणि दासबोध या मध्ये काय फरक आहे का?


मनुस्मृती, न्याणेश्वरी, दासबोध या मध्ये काय फरक आहे का?

ऋग्वेदामध्ये जे श्लोक आहेत. तेच पुरुषसुक्तामध्य
े आहेत. पुरुषसुक्तामध्ये जे श्लोक आहेत तेच मनुस्मृती मध्ये आहेत. मनुस्मृती मध्ये जे श्लोक आहेत तेच न्याणेश्वरी मध्ये आहेत. न्याणेश्वरीमध्ये जे श्लोक आहेत तेच दासबोधा मध्ये आहेत. याचा अर्थ ब्राम्हणांनी आजवर त्यांचे वर्चस्व टिकवून ठेवण्याचा प्रयत्न केलेला दिसून येतो. वरील तिन्हीही ग्रंथाचे ब्राम्हण रचियते सुमती भार्गव, न्याणेश्वर, रामदास हे जातीवादी आणि चातुर्वण्य मानणारे वळ वळणारे जंत होते. ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रांनी कोणते काम केले पाहीजे? हे ज्याप्रमाणे मनुस्मृतीने सांगितले आहे तेच पुढे न्याणेश्वर भटानी सांगितले आहे. आणि या दोहोँचाही वारसा पुढे रामदासाने नेटाने चालविलेला आहे. म्हणून या तिघांनीही कसे त्याकाळातील परिस्थीती, वेळ, काळ पाहून कसे विषारी फुत्कार सोडले आहेत किँवा सगळे बामण कसे एकाच माळीचे मणी असतात हे पुढीलप्रमाणे कसे सिध्द केले आहे ते थोडक्यात पहा...

1) मनुस्मृती

"सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थँ स महाद्युति:।
मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत्" (1:87)
"अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राम्हणानामकल्पयत्" (1:88)
"प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासत: (1:89)
"पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।
वाणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च" (1:90)
"एकमेव तु शुद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत् ।
एतेषामेव वर्णानां शुशुषामनसूयया" (1:91)

वरील श्लोकामध्ये ब्रम्हदेवाने गर्भवती राहीला असून त्यानेच चार वर्ण आपल्या शरिराच्या विशिष्ट भागामधून अर्थात मुखातून ब्राम्हण, बाहुतून क्षत्रिय, मांडीतून वैश्य आणि पायातून शुद्र असे वर्ण निर्माण करुन त्यांना त्यांच्या कामाचेही मनुस्मृतीच्या वरील श्लोकातून वाटप करण्यात आले जसे कि शिक्षण घेणे, विद्यार्जन करणे, दान घेणे अशा प्रकारची प्रमुख आयत्या बिळात नागोबासारखे आरामदायी कामे ब्राम्हणांनी त्यांच्याकडे घेवून प्रजेचे रक्षण करणे, दान धर्म ही क्षत्रियांनी करावयाची कामे तर जनावरे पाळने, व्यापार, सावकारी ही वैश्याची कामे तर शुद्रांनी या तिन्ही वर्णाची सेवा करणे अशा प्रकारच्या कामाची वाटप मनु ने केलेली आहे वरील श्लोकामधून ब्राम्हणांनी ज्या अर्थी स्वताकडे श्रेष्टत्व ठेवले त्या अर्थी ही शेँडीधारी मंडळी नक्कीच नीच होती हे सिध्द होते आणि ज्या अर्थी ईतर वर्ण व सर्वात जास्त शुद्र हिणवले गेले त्या अर्थी ही जात नक्कीच महान होती श्रेष्ट होती हे सिध्द होते. मनुस्मृतीचे काम वाटपसंदर्भात दिलेले मत झाल्यानंतर आता न्याणेश्वरीचा रचियता ज्ञानेश्वर  कसा जातीवादी आहे. तो मनुस्मृतीमध्ये जी चातुर्वण्यपध्दत मानली गेली आहे किँवा कोणत्या वर्णाने काय कार्य केले पाहीजे हे थोडक्यात पुढील प्रमाणे पहा...

2) ज्ञानेश्वरी
"तेचि चारी वर्ण । पुससी जरी कोण कोण ।
तरी जयां मुख्य ब्राम्हण धुरेचे कां" (818)
"येर क्षत्रिय वैश्य दोन्ही । तेही ब्राम्हणाच्याचि मानिजे मानी ।
जे ते वैदिकाविधानी । योग्य म्हणौनि" (819)
"चौथा शूद्रु, जो धनंजया । वेदी लागू नाही तया
तह्री वृत्ति वर्णत्रया अधिन तयाची" (820)
"आणि वैश्य क्षत्रिय ब्राम्हण। हे द्विजन्मे तिन्ही वर्ण ययांचे जे शुश्रूषण। ते शुद्रकर्म" (18:883)
"पै द्विजसेवेपरौतेँ। धावणे नाही शुद्रातेँ ।
एवं चतीर्वर्णोचितेँ । दाविली कर्मे॥" (18:884)
"तैसे वर्णाश्रमवशेँ । जे करणीय असे ।
गोरेया आंगा जैसे । गोरेपण" (18:887)
"हे विहित कर्मपांडवा । आपुला अनन्य ओलावा ।
आणि हेचि परमसेवा मज सर्वात्मकाची" (18:906)
"अगा जया जे विहित । ते ईश्वराचे मनोगत ।
म्हणौनि केलिय निभ्रांत । सापडेचि तो" (18:911)
"तुम्हा वर्णविशेषवशे । आम्ही हा स्वधर्मुचि विहिला असे ।
याते उपासा मग आपैसे । पुरती काम" (3:88)
"म्हणौनि स्वधर्मु जो सांडील । तयाने काळु दंडील
चोरु म्हणौनि हरील । सर्वस्व तयाचे" (3:112
   ज्ञानेश्वरी च्या वरील श्लोकावरुन ज्ञानेश्वर  भट हा किती जातियवादी मानसिकतेचा होता हे सिध्द होते. ज्याप्रमाणे मनुस्मृती ब्राम्हण सोडून इतर वर्णीयांनी कोणती कामे केली पाहीजेत हे सांगते तेच न्यानेश्वर कुलकर्णी ने त्याच्या न्यानेश्वरीमधून सांगितलेले आहे.  ज्ञानेश्वर भट हा फक्त ब्राम्हणांनाच श्रेष्ट समजत होता तर ईतर वर्णाँना निच समजत होता हे त्याने वरती दिलेल्या श्लोकातून सिध्द होते. वरील वर्णांनी कोणताही दुजाभाव न करता ब्राम्हणांची सेवा केली पाहीजे असे ज्ञानेश्वर   कुलकर्णी ठासून सांगतो. पुढे तो ब्राम्हणाची सेवा हीच ईश्वराची सेवा आहे असे ज्ञानेश्वर सांगतो. मग इथे प्रश्न हा निर्माण होतो कि ब्राम्हणाची सेवा हीच ईश्वराची सेवा आहे असे या भटाला का सांगायचे आहे? बरे बामणांचीच सेवा करणे असा काही नियम आहे कधी तरी शुद्रांची ही सेवा केली पाहीजे असे या कुलकर्णीला वाटत नाही का? याचाच अर्थ ज्ञानेश्वर हा त्याकाळातील शुद्र व आताचे एससी, एसटी, ओबीसी, मराठा यांना बामणांची सेवा करण्यासाठी देवाची भिती घालतो. यावरुनच न्याणेश्वरी आणि त्याचा रचियता जाणवेधारी  ज्ञानेश्वर कुलकर्णी हा किती जातीयवादी भट होता हे सिध्द होते. सुमती भार्गव लिखीत मनुस्मृती, ज्ञानेश्वर  कुलकर्णी लिखित न्याणेश्वरी झाल्यानंतर आता रामदास लिखीत दासबोध हा ग्रंथ ही जातीवाद आणि चातुर्वण्य पध्दत मानतो ते पुढीलप्रमाणे थोडक्यात पहा...

3) दासबोध

"नीच प्राणी गुरुत्व पावला । तेथे आचारचि बुडाला ।
वेदशास्र ब्राम्हणाला । कोण पुसे" (दासबोध 14. 7)
"ब्रम्हग्यानाचा विचारु । त्याचा ब्राम्हणापासीच अधिकारु ।
'वर्णानां ब्राम्हणो गुरु:' ऐसे वचन।
गुरुत्व आले नीचयानी । काही एक वाढली महंती
शुद्र आचार बुडविती । ब्राम्हणांचा ।
गुरु तो सकळांसी ब्राम्हण । जह्री तो झाला क्रियाहीन ।
तरी तयासीच शरण । अनन्यभावे असावे ।
सकळासि पुज्य ब्राम्हण । हे मुख्य वेदण्या प्रमाण ।
वेदविरहिते ते अप्रमाण । ते अप्रिये भगवंता ।
ब्राम्हण वेद मुर्तीमंत । ब्राम्हण तोचि भगवंत
पुर्ण होती मनोरथ । विप्रवाक्ये करुनि ।"
(दासबोध 5-1,6,10,12)
"अंत्यज शब्दग्याता बरवा । परी तो नेऊन काये करावा
ब्राम्हणासन्निध पुजावा । हे तो न घडे की"
(दासबोध 5,1,16)

पाहिलत हे न्याणेश्वरानी आणि रामदासानी कसा मनुस्मृतीचाच वारसा हक्क पुढे नेहला आहे. रामदास हा वेद सांगतील ते प्रमाण मानतो. त्यानेही वरील श्लोकामध्ये ब्राम्हणांना ईश्वर संबोधून त्याची सेवा शुद्रानी केली पाहीजे असा अट्टाहास धरतो. म्हणून मला तरी वरील तिन्हीही ग्रंथामध्ये कोणताही फरक दिसत नसून हे तिन्ही ग्रंथ सारखेच जातीयवादी होते हे सिध्द होते. अशा ग्रंथाचे पारायण नव्हे तर दहन मात्र झाले पाहीजे या मताचा मी आहे.
तसेच मनुस्मृतीचा, न्याणेश्वरीचा, दासबोधाचा अट्टाहास धरणाय्रा या तिन्हीही ब्राम्हण लिखित ग्रंथाचा डंका पिटणाय्रा त्या ब्राम्हणवाद्यांना माझे काही प्रश्न आहेत ते पुढीलप्रमाणे पहा...

1) मनुस्मृती मध्ये काही श्लोक चांगले आहेत असे बोलणाय्रांनी बाबासाहेबांनी मनुस्मृती का जाळली याचे उत्तर द्यावे?
2) लहान वयात अर्थात पंधरा सोळाव्या वर्षी ज्ञानेश्वर  कुलकर्णी ने ज्ञानेश्वरी लिहून खुप चांगले कार्य केले आहे असे तोँड वासून बोलणाय्रांना शिवपुत्र युवराज छत्रपती संभाजी महाराजांनी वयाच्या चौदाव्या वर्षी चार ग्रंथ नखशिखा, नायिकाभेद, सातसतक, बुधभुषण नावाचे चार ग्रंथ लिहले ते तुम्हा लोकांना दिसत नाहीत का?
3) दासबोध आणि त्याचा रचियता शिवद्रोही रामदास याची वाह वाह करणाय्रा तमाम भटांना संत तुकाराम महाराजांची गाथा त्यांनी लिहलेली रचना दिसत नाहीत का?
द्या उत्तरे भटांनो?
- लेखक - निरंजन लांडगे...